ध्यानी जी धार्मिक यात्रा पर थे. ठगी के शिकार हो गए. बात बहुत छोटी है लेकिन है पिंच करने वाली. ध्यानी जी आस्थावादी हैं. उन्हें लगता है कि धर्म से समाज सुधर सकता है. वह हाल ही में वह एक देवी मंदिर गए. देवी मंदिर जंगल के बीच स्थित है. सैकड़ो साल पुराना है. बगल से नदी बहती है. कथा है कि कभी यहां चरवाहे पशुओं को चराने आया करते थे. उन्हें देवी के दर्शन हुए. इस स्थल की बड़ी मान्यता है.
परेशान हाल मध्यवर्गीय जन अपनी मानसिक, भौतिक समस्याएं लेकर आते हैं. कष्ट दूर करने की प्रार्थनाएं करते हैं. मनोवांछित फल पाने के संकल्प लेते हैं. उनके पूरा हो जाने पर पुंनः दर्शन करने की अभिलाषा करते हैं.मानवीय संवेदना और आस्था के इसी जंगल में बाजार ने अपना डेरा डाल लिया है. फूल, प्रसाद, चढ़ावे, जलपान के कारोबार ने गहरी जगह बना ली है.
ध्यानी जी दर्शन को पहुंचे. दिन मंगलवार था. पूजन सामग्री खरीदी. प्रसाद लिया. चरण पादुका के गायब होने की चिंता भी थी. दुकानदार के वहां सुरक्षित किया. दर्शन की लाइन में लग गए. विधिवत पूजा की. देवी दर्शन किया. लिखा हुआ था – ‘कपूर अगरबत्ती मंदिर के अंदर जलाना वर्जित है.’
अतः निश्चित स्थान पर पहुंचे. हवा थोड़ी तेज गति थी. अगरबत्तियां जलानी चाही. तीली पर तीली जलाते रहे. मैचबॉक्स की आधी तीलियां जला डालीं पर मुई अगरबत्ती ने आग न पकड़ी. चिंतित मन पूजा स्थल से बाहर आ गए. उस दुकान पर जा पहुंचे जहां से पूजन सामग्री क्रय की थी. शिकायत की. उत्तर मिला “सब तो ले गए पर शिकायत किसी ने नहीं की”.
ध्यानी जी इस ठगी से हतप्रभ हैं. आस्था के इस परिसर में उनके पास सवाल दर सवाल हैं. वे सोचते हैं कि यहां बिकने वाली पूजन सामग्री, खाद्य पदार्थ आदि के लिए क्वालिटी कंट्रोल व्यवस्था नहीं हो सकती? कोई इनकी जांच क्यों नहीं करता? अगर कोई जांच करता भी हो तो उसका परिणाम क्या होता होगा? क्या कोई दंडित भी हुआ? आखिर आस्था के नाम पर लोग कब तक ठगी के शिकार होते रहेंगे ?
प्रश्नों के जाल में उलझे ध्यानी जी ने चाय की चुस्कियां लेने की सोची. दुकान पर पहुंचे. चाय आती इसी बीच उनकी नजर अखबार पर पड़ी. खबर छपी थी – “मथुरा में कुट्टू के पकवान खाकर 90 लोग बीमार”. दुकान पर लिखा था “हम सुधरेंगे जग सुधरेगा”. ध्यानी जी चिंतित हैं, हम तो सुधर गए लेकिन जग कब सुधरेगा.
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