What is Kharmas: भारतीय जनमानस में जैसे ही खरमास (जिसे मलमास या पौष मास भी कहा जाता है) का आरंभ होता है, मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। समाज में एक आम धारणा है कि इस दौरान “शुभ कार्य वर्जित” होते हैं। कई बार आधुनिक पीढ़ी इसे केवल एक अंधविश्वास मान लेती है।
किंतु, गीता वाटिका, गोरखपुर के संतों और विद्वानों का मत है कि यह निषेध केवल अंधविश्वास नहीं है, बल्कि इसके पीछे ज्योतिषीय, पौराणिक और सांस्कृतिक—तीनों स्तरों पर एक सुगठित तर्क मौजूद है। आइए, जानते हैं खरमास के पीछे का विज्ञान और आध्यात्म।
क्या है खरमास के पीछे का ज्योतिषीय तर्क?
शास्त्रों के मर्म को समझे बिना किसी नियम को केवल ‘निषेध’ मान लेना उचित नहीं है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, खरमास की स्थिति तब बनती है जब सूर्य ‘धनु राशि’ में प्रवेश करता है।
- गुरु के घर में सूर्य: धनु राशि देवगुरु बृहस्पति (गुरु) की राशि है। जब सूर्य, गुरु की राशि में प्रवेश करता है, तो ज्योतिषीय भाषा में इसे “गुरु का तेज आच्छादित होना” या गुरु का अप्रत्यक्ष रूप से अस्त होना माना जाता है।
- मांगलिक कार्यों पर प्रभाव: भारतीय संस्कृति में विवाह, मुंडन, और गृहप्रवेश जैसे संस्कार ‘गुरु’ (Jupiter) के बल पर आधारित होते हैं। गुरु को ही धर्म, वृद्धि और दांपत्य सुख का कारक माना गया है। जब गुरु का प्रभाव क्षीण होता है, तो संस्कारों की स्वाभाविक अनुकूलता कम हो जाती है। इसीलिए धर्मशास्त्रों में इस काल को संस्कारों के लिए अनुपयुक्त बताया गया है।
अंतर्मुखी साधना का समय है खरमास
एक अन्य दृष्टिकोण से देखें तो खरमास वह समय है जब सूर्य दक्षिणायन की ओर गतिशील होता है और पौष मास के आसपास उसकी गति अपेक्षाकृत मंद मानी जाती है। सूर्य को कालचक्र और प्राणशक्ति का स्रोत माना गया है।
गीता वाटिका के प्रवचन के अनुसार, जब बाह्य जगत में सूर्य की सक्रियता कम होती है, तब शास्त्रों ने हमें अंतर्मुखी साधना का निर्देश दिया है।
- इस समय बाह्य कर्मकाण्ड (जैसे विवाह-उत्सव) की जगह तप, जप, दान और संयम को प्रधानता दी जाती है।
- यही कारण है कि इस अवधि में तीर्थ स्नान और भगवत भजन को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
क्या खरमास में कार्य करने से अनिष्ट होता है?
यह एक बड़ा प्रश्न है कि यदि इस काल में शुभ कार्य कर लिया जाए, तो क्या कोई विपत्ति आ जाएगी? ज्योतिष शास्त्र इसका उत्तर बहुत ही संतुलित ढंग से देता है।
शास्त्र यह नहीं कहते कि खरमास में कार्य करने से ‘अनिवार्य रूप से’ विपत्ति आएगी। इसका अर्थ केवल इतना है कि इस समय ग्रहों की ‘सामूहिक अनुकूलता’ कम होती है, जिससे कार्य में अपेक्षित सफलता और स्थायित्व प्राप्त करने में बाधा आ सकती है। यह ‘निषेध’ किसी दैवीय दंड का भय नहीं, बल्कि ‘काल-चयन’ (Timing) की विवेकपूर्ण सावधानी है।
अपवाद और व्यावहारिक दृष्टिकोण
धर्मशास्त्र जड़ नहीं हैं, वे लचीले और व्यावहारिक हैं। खरमास के नियमों में भी अपवाद स्वीकार किए गए हैं:
- विशेष कुंडली योग: यदि किसी जातक की कुंडली में गुरु अत्यंत बलवान हो और अन्य ग्रह अनुकूल हों, तो यह दोष प्रभावी नहीं रहता।
- आपद्धर्म (Emergency): शास्त्र कहते हैं— ‘आपद्धर्मो बलवान्’। यानी, आपातकाल, आजीविका, चिकित्सा, शिक्षा या अति-आवश्यक गृह निर्माण जैसे कार्यों पर यह निषेध लागू नहीं होता।
खरमास में शुभ कार्यों का वर्जन कोई अंध-निषेध नहीं, बल्कि काल-तत्त्व और ग्रह-तत्त्व की संगति पर आधारित एक ‘सांस्कृतिक अनुशासन’ है। इसका उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि जीवन में लय और संतुलन बनाए रखना है। यदि कोई श्रद्धा से इस काल में संयम बरतता है, तो वह श्रेष्ठ है; और यदि कोई विवशता में कार्य करता है, तो उसे पापी मान लेना भी ज्योतिष का निष्कर्ष नहीं है।
स्रोत व आभार: यह आलेख गीता वाटिका, गोरखपुर में दिए गए प्रवचन और कथा प्रसंगों पर आधारित है। धर्म और आध्यात्म की सही समझ के लिए सत्संग और स्वाध्याय निरंतर करते रहें।