जब मैं आज के गोरखपुर को देखता हूं, तो मुझे 70 साल पहले का वह सफ़र याद आता है। तब मेरी उम्र कोई 5 साल की रही होगी, और मैं अपनी माँ की उँगली पकड़कर इस शहर से गुज़रते हुए अपने ननिहाल, यानी सपनों के देश जाया करता था। उन नन्हीं आँखों के लिए गोरखपुर किसी परिकथा जैसा शहर था, जहाँ राप्ती नदी का पानी चाँदी-सोने की तरह चमकता था और एक छोटी सी यात्रा भी एक बड़े अभियान जैसी लगती थी।
यह उन दिनों की बात है जब गोरखपुर की यात्रा का मतलब सिर्फ़ एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं था, बल्कि यह धैर्य, उत्साह और प्रकृति से जुड़ा एक गहरा अनुभव था। चलिए, मैं आपको अपनी स्मृतियों के गलियारों में ले चलता हूं और उस गोरखपुर को महसूस कराता हूं, जहाँ सफ़र की कठिनाइयों में भी एक अनोखी मिठास छिपी थी।
स्मृतियों का तैरता पुल: पीपे का पुल
आज जहाँ राजघाट पर राप्ती नदी के ऊपर विशाल कंक्रीट के पुल खड़े हैं, वहाँ कभी एक अस्थायी व्यवस्था हुआ करती थी जिसे ‘पीपे का पुल’ कहते थे। यह लोहे के बड़े-बड़े पीपों को जोड़कर बनाया गया एक तैरता हुआ रास्ता था, जो शहर के दो किनारों को जोड़ता था। एक बच्चे की आँखों के लिए पानी पर तैरता यह रास्ता अपने आप में एक अजूबा था।
इसकी अपनी एक व्यवस्था थी। यह पुल केवल उन महीनों में इस्तेमाल होता था जब नदी में बाढ़ नहीं होती थी। बरसात के दिनों में जब राप्ती उफान पर होती, तब नदी पार करने का एकमात्र साधन नाव हुआ करती थी। उस कीचड़ भरे रास्ते पर हम अपने जूते (उपानह) हाथ में उठाकर नाव तक पहुँचते थे। चाहे नाव हो या पुल, इसे पार करने के लिए एक शुल्क भी देना पड़ता था, जिसे ‘मल्लाही’ कहते थे। यह पुल उस दौर की एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण व्यवस्था थी, जो मौसम के रहमोकरम पर निर्भर थी और जिसने मुझ जैसे अनगिनत लोगों को नदी के पार उनके सपनों के देश तक पहुँचाया।
उम्मीदों का वाहन: इक्का
गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद सफ़र का अगला पड़ाव शुरू होता था—राजघाट तक पहुँचना, जो अपने आप में एक चुनौती थी। उन दिनों रिक्शे बहुत कम थे, और यात्रा का मुख्य साधन घोड़ा-गाड़ी यानी ‘इक्का’ हुआ करता था। स्टेशन के बाहर इक्के एक तय जगह पर खड़े मिलते और हम अपना साजो-सामान लेकर मोल-भाव करके उस पर सवार हो जाते।
यह सफ़र आसान नहीं था। सड़क पक्की नहीं, बल्कि खड़ंजे की थी, जिस पर इक्का हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ता था। घोड़े के लिए यह यात्रा और भी कठिन हो जाती, खासकर जब उसे नदी का ऊँचा तटबंध चढ़ना पड़ता। तब एक अद्भुत दृश्य देखने को मिलता था—गाड़ी में बैठी महिलाओं और बच्चों को छोड़कर सभी पुरुष यात्री नीचे उतर जाते थे और इक्केवान के साथ मिलकर घोड़े को “शाबाशी” देते हुए उसे ऊपर चढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। वह इक्का सिर्फ़ एक वाहन नहीं था, बल्कि उस दौर की उम्मीदों और आकांक्षाओं का प्रतीक था।
तकनीक और बाजार के विकास में वे इक्के जो उम्मीद और हसरतों की निशानी हुआ करते थे, न जाने अब कहाँ खो गए।
कठिनाई की मिठास: विकास का विरोधाभास
आज गोरखपुर स्टेशन से मेरे ननिहाल नगवा गाँव तक की वही 12-15 किलोमीटर की दूरी आधे घंटे से भी कम समय में तय हो जाती है। सड़कें चिकनी हैं और गाड़ियाँ तेज़। लेकिन इस सुविधा ने मुझसे कुछ छीन भी लिया है। 70 साल पहले मेरे लिए यह सफ़र एक पूरा अभियान था। गाँव से कुछ दूर पैदल चलना, फिर बैलगाड़ी, उसके बाद कैंपियरगंज से ट्रेन पकड़कर गोरखपुर पहुँचना। स्टेशन पर उतरकर इक्के से राजघाट जाना, फिर पीपे के पुल या नाव से नदी पार करना, और उसके बाद नदी के उस पार से एक और इक्का करके आख़िरकार अपने ननिहाल पहुँचना।
यह कठिन था, असुविधाओं से भरा था, लेकिन इसमें एक रोमांच था, एक उत्साह था। हर पड़ाव एक छोटी सी जीत जैसा लगता था। यही विकास का विरोधाभास है। हमने समय तो बचा लिया, लेकिन उस सफ़र की मिठास खो दी।
सफ़र कठिन था लेकिन उस चुनौती का, उस छोटी सी चुनौती का आनंद भी बहुत गहरा था।
शायद आधुनिक जीवन की सहजता ने हमसे उन छोटी-छोटी चुनौतियों पर विजय पाने की गहरी खुशी छीन ली है। जब सब कुछ इतना आसान हो गया है, तो शायद किसी मंज़िल को पाने का एहसास उतना गहरा नहीं रह गया है।
क्या हम मंज़िल पर कुछ ज़्यादा जल्दी पहुँच गए?
इसमें कोई शक नहीं कि गोरखपुर आज एक आधुनिक और साधन-संपन्न शहर है। कंक्रीट के पुलों और चौड़ी सड़कों ने जीवन को आसान बना दिया है। लेकिन इस प्रगति की दौड़ में, मेरी बचपन की सपनीली आँखों से दिखने वाली चाँदी-सोने जैसी राप्ती और उस कठिन सफ़र की मिठास कहीं पीछे छूट गई है।
वह यात्रा जो कभी मेरे सपनों के देश तक पहुँचने का एक यादगार अभियान हुआ करती थी, अब बस कुछ मिनटों की दूरी बन कर रह गई है। इस रफ़्तार ने हमें गति तो दी है, पर शायद उस अनुभव की गहराई छीन ली है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है: जैसे-जैसे हमारे शहर आगे बढ़ रहे हैं, हम अपने अतीत की कौन सी साधारण खुशियों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं?