नई दिल्ली: एलन मस्क की कंपनी ‘स्टारलिंक‘ सहित अन्य सैटेलाइट इंटरनेट (सैटकॉम) सेवाओं का इंतजार कर रहे भारतीयों के लिए महत्वपूर्ण खबर है। केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा मानकों और स्पेक्ट्रम के मूल्य निर्धारण से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी कारणों से इन सेवाओं की लॉन्चिंग में समय लग रहा है।
सुरक्षा मानकों और ‘डेटा रेजिडेंसी’ पर सरकार का कड़ा रुख
मंत्री सिंधिया के अनुसार, स्टारलिंक, वनवेब और रिलायंस जियो जैसी कंपनियों के लिए सबसे पहली शर्त ‘सुरक्षा अनुपालन’ है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि इन सेवाओं का पूरा डेटा भारत की सीमाओं के भीतर ही रहना चाहिए (Data Residency)। फिलहाल, कंपनियों को अपनी अनुपालन क्षमता साबित करने के लिए ‘अस्थायी स्पेक्ट्रम’ दिया गया है, ताकि वे सुरक्षा एजेंसियों द्वारा निर्धारित मानकों पर खरी उतर सकें।
स्पेक्ट्रम की कीमत को लेकर TRAI और DoT में छिड़ी जंग
लॉन्चिंग में देरी का दूसरा बड़ा कारण स्पेक्ट्रम का मूल्य निर्धारण है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) और दूरसंचार विभाग (DoT) के बीच कुछ प्रस्तावों को लेकर मतभेद सामने आए हैं:
- शुल्क विवाद: TRAI ने DoT के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है जिसमें वार्षिक स्पेक्ट्रम शुल्क को 4% से बढ़ाकर 5% करने की बात कही गई थी।
- कनेक्शन फीस: शहरी क्षेत्रों में प्रति कनेक्शन 500 रुपये का शुल्क हटाने के प्रस्ताव पर भी अभी सहमति नहीं बन पाई है।
अब कैबिनेट के पाले में गेंद, जल्द होगा अंतिम फैसला
नियामक संबंधी इन विवादों के बाद अब दूरसंचार विभाग इस मामले को ‘डिजिटल संचार आयोग’ (DCC) के समक्ष पेश करेगा। उम्मीद जताई जा रही है कि एक बार स्पेक्ट्रम की कीमतें अंतिम रूप से तय हो जाने और सुरक्षा मानक पूरे होने के बाद, मामला अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय कैबिनेट के पास जाएगा। इसके बाद ही एलन मस्क की स्टारलिंक को भारत में व्यवसायिक संचालन का अधिकार मिल सकेगा।