गोरखपुर: उत्तर प्रदेश का गोरखपुर क्षेत्र इन दिनों पूर्वांचल में साइबर ठगी के सेंटर के रूप में कुख्यात होता रहा है। साइबर अपराधियों ने रिटायर्ड, आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को निशाने पर ले लिया है। इस हफ्ते कई ऐसे मामले पुलिस के सामने आए हैं, जिनसे पता लगता है कि ये सिंडिकेट कितनी आसानी से लोगों को अपना शिकार बना ले रहा है, और वह भी बिना कोई डिजिटल फुटप्रिंट छोड़े जिससे पुलिस उन तक पहुंच सके। ठगों ने पेट्रोलियम कंपनी के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी से 1.48 करोड़ रुपये और अस्करगंज के एक व्यापारी से 40.41 लाख रुपये की भारी राशि हड़प ली। पुलिस के अनुसार, यह अपराधी अब पारंपरिक ठगी के बजाय परिष्कृत ‘डिजिटल सिंडिकेट’ मॉड्यूल पर काम कर रहे हैं, जो सीधे पीड़ितों की मनोवैज्ञानिक कमजोरी पर प्रहार करता है।
22 दिसंबर से 14 जनवरी के बीच 1.48 करोड़ की रिकॉर्ड डकैती
एम्स थाना क्षेत्र के इंजीनियरिंग कॉलेज के पास रहने वाले पेट्रोलियम कंपनी के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के साथ हुई ठगी ने सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा दिए हैं। अपराधियों ने महज 24 दिनों के भीतर पीड़ित की जीवनभर की जमा पूंजी, कुल 1,47,09,795 रुपये, विभिन्न बैंक खातों में ट्रांसफर करवा लिए। इस खेल में ‘अपूर्वा मल्टीब्रांड शोरूम’ नामक एक फर्जी वर्चुअल एप का इस्तेमाल किया गया, जहां पीड़ित को निवेश पर 20% तक का भारी मुनाफा दिखाया जाता था। जब पीड़ित ने अपने 2.11 करोड़ रुपये के आभासी लाभ को निकालने का प्रयास किया, तो उससे 50 लाख रुपये की अतिरिक्त मांग की गई।
व्हाट्सएप एन्क्रिप्शन और 30 मिनट वाले ‘वोलाटाइल’ लिंक का खेल
जांच में सामने आया है कि अपराधी फेसबुक पर 15-20% लाभ का लालच देकर शिकार फंसाते हैं और तुरंत बातचीत को व्हाट्सएप जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं। साक्ष्य मिटाने के लिए ये सिंडिकेट मात्र 20 से 30 मिनट की वैधता वाले ‘एपहेमरल’ (अल्पकालिक) लिंक्स का उपयोग करते हैं, जो डिजिटल फोरेंसिक जांच में डेटा को पूरी तरह गायब कर देते हैं। ‘एमके फायर्स सिक्योरिटीज ग्रुप’ और ‘निशा मिश्रा’ जैसे काल्पनिक पात्रों का उपयोग कर पीड़ितों का मनोवैज्ञानिक शोषण किया जा रहा है।
40 लाख की ठगी में ‘संक कॉस्ट फैलेसी’ का प्रयोग
कोतवाली थाना क्षेत्र के वार्ड नंबर 68, अस्करगंज निवासी अयाजुद्दीन खान भी इस सिंडिकेट का शिकार बने, जिनसे 16 दिसंबर से 6 जनवरी के बीच 40.41 लाख रुपये लूट लिए गए। अपराधियों ने यहां ‘संक कॉस्ट फैलेसी’ (डूबती लागत का भ्रम) तकनीक का इस्तेमाल किया; यानी जब पीड़ित को अपनी निवेशित रकम डूबने का डर सताता है, तो अपराधी उसे वापस पाने के नाम पर और पैसे ऐंठते हैं। इस मामले में व्हाट्सएप जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म पर संचार को स्थानांतरित कर साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश की गई, जिससे पुलिस के लिए डिजिटल ट्रेल ढूंढना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
आजमगढ़ के सिंडिकेट और पारिवारिक रिश्तों में सेंधमारी का नया ट्रेंड
ठगी का यह जाल केवल डिजिटल निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘विश्वमोहन उपाध्याय सिंडिकेट’ जैसे समूह अब रियल एस्टेट और पारिवारिक संबंधों का फायदा उठाकर भी लूट कर रहे हैं। आजमगढ़ निवासी इस सिंडिकेट ने बड़हलगंज के डॉ. रमेश चंद से जमीन के नाम पर 50 लाख रुपये हड़पे, जिसमें बलिराम निषाद और विजय रस्तोगी के खातों का उपयोग मनी ट्रेल के लिए किया गया। वहीं, खोराबार में तैनात बीएसएफ जवान विकास कुमार सिंह के साथ उनके सगे साले और पत्नी ने ही 5.60 लाख रुपये की धोखाधड़ी कर डाली, जो अपराधियों के ‘सोशल इंजीनियरिंग’ मॉड्यूल की भयावहता को दर्शाता है।