Mental Stress and Modern Lifestyle: रमेश एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं। रोज सुबह बस से ऑफिस जाते वक्त मोबाइल में इतना खो जाते हैं कि लंबा सफर कैसे कट जाता है, पता ही नहीं चलता। पास बैठे व्यक्ति से बात करने की जरूरत महसूस नहीं होती, और अगर कोई रास्ता पूछ ले, तो जवाब मिलता है—”गूगल मैप देख लीजिए।” एक दिन तो मोबाइल में वे इतना व्यस्त हुए कि बस कब उनके स्टॉप से आगे निकल गई, उन्हें खबर ही नहीं हुई।
यह कहानी सिर्फ रमेश की नहीं, बल्कि आज के आधुनिक समाज की हकीकत है। एम्स गोरखपुर (AIIMS Gorakhpur) के मनोचिकित्सा विभाग के डॉ. मनोज पृथ्वीराज और डॉ. ऋचा ने आधुनिक जीवनशैली और उससे उपज रहे मानसिक तनाव को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि सुविधाएं बढ़ने के साथ-साथ मानसिक रोग भी तेजी से बढ़ रहे हैं।
सुविधाओं के बीच खोती मानसिक शांति
एम्स गोरखपुर के मनोचिकित्सक डॉ. मनोज पृथ्वीराज बताते हैं कि आज की दुनिया ने हमारी जिंदगी आसान जरूर बना दी है। टैक्सी, खाना, सामान और यहां तक कि डॉक्टर की सलाह भी एक क्लिक पर उपलब्ध है। लेकिन, इस आसानी की एक भारी कीमत हम चुका रहे हैं। आज हमारा दिन मोबाइल की घंटी से शुरू होता है और रात को रील देखते हुए खत्म होता है। न नींद पूरी होती है और न ही मन को शांति मिलती है। ट्रैफिक जाम, ऑफिस में बॉस की डांट और घर की चिंता के बीच व्यक्ति इतना उलझ गया है कि उसके पास दूसरों के लिए तो क्या, खुद के लिए भी समय नहीं है। सोशल मीडिया ने तुलना करने की आदत को इतना बढ़ा दिया है कि लोग पल को जीने के बजाय उसे रिकॉर्ड करने में व्यस्त हैं। दूसरों की चमकदार जिंदगी देखकर हम अपनी शांति खो रहे हैं।
बच्चों पर बढ़ता पढ़ाई और उम्मीदों का बोझ
डॉ. मनोज पृथ्वीराज ने बच्चों की स्थिति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पहले बच्चे मैदान में खेलते थे और दादी-नानी की कहानियां सुनते थे, लेकिन आज उनके हाथों में मोबाइल है और मन में पीछे रह जाने का डर। कोचिंग और ओलंपियाड की दौड़ में उन्हें यही सिखाया जा रहा है कि “अगर तेज नहीं दौड़ोगे तो पीछे रह जाओगे।” स्थिति यह है कि पांचवीं कक्षा का बच्चा भी पढ़ाई के तनाव से जूझ रहा है, जिससे उसे पेट दर्द, सिरदर्द और नींद न आने जैसी समस्याएं हो रही हैं। माता-पिता अनजाने में अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों पर डाल रहे हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक है।
अकेलापन और शारीरिक बीमारियों का कारण
एम्स गोरखपुर की मनोचिकित्सक डॉ. ऋचा का कहना है कि परिवार अब छोटे होते जा रहे हैं। लोग एक छत के नीचे साथ तो बैठते हैं, लेकिन आपस में बातचीत नहीं करते; हर कोई अपने मोबाइल में व्यस्त है। यह आदत धीरे-धीरे अकेलेपन को बढ़ा रही है। तनाव का असर सिर्फ मन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर को भी खोखला कर रहा है। उच्च रक्तचाप (BP), मधुमेह, हृदय रोग और मोटापा अब सिर्फ बुजुर्गों की बीमारियां नहीं रहीं, बल्कि युवाओं में भी हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों की नई कार या विदेश यात्रा देखकर युवाओं में हीन भावना, ईर्ष्या और अवसाद (Depression) जन्म ले रहा है।
महिलाओं और ग्रामीण जीवन पर असर
डॉ. ऋचा के अनुसार, पढ़ी-लिखी कामकाजी महिलाओं पर दोहरा दबाव है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे ऑफिस और घर दोनों को बखूबी संभालें, जिससे वे शारीरिक और मानसिक रूप से टूट रही हैं। यह समस्या अब सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है। गांवों में भी मोबाइल और इंटरनेट के जरिए प्रतिस्पर्धा पहुंच चुकी है। खेती की जमीन कम हो रही है और रोजगार के लिए युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जहां संघर्ष कम नहीं है। डॉक्टर द्वय का कहना है कि तेज रफ्तार जिंदगी में हमने धैर्य खो दिया है और हम खुद को मशीन समझने लगे हैं।
क्या है समाधान?
डॉ. मनोज और डॉ. ऋचा का मानना है कि इस दौड़ को पूरी तरह रोकना तो संभव नहीं है, लेकिन इसे संतुलित किया जा सकता है। उन्होंने इसके लिए कुछ अहम सुझाव दिए हैं:
- दिन में कुछ समय मोबाइल से दूरी बनाएं (Digital Detox)।
- परिवार के साथ भोजन करें और आमने-सामने बातचीत करें।
- नियमित रूप से टहलें, योग करें या कोई खेल खेलें।
- हर चीज में परफेक्ट बनने की होड़ छोड़ें और अपनी भावनाओं को साझा करें।
महत्वपूर्ण तथ्य और घटनाक्रम
समस्या की जड़:
- सुबह: मोबाइल अलार्म और सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग।
- दिन: ट्रैफिक, ऑफिस का दबाव, ई-मेल, तुलना।
- रात: नींद की कमी, रील देखना, भविष्य की चिंता।
दुष्प्रभाव:
- बच्चे: सिरदर्द, पेट दर्द, पढ़ाई का डर।
- युवा: हार्ट अटैक, बीपी, अकेलापन, डिप्रेशन।
- महिलाएं: दोहरा कार्यभार, थकान।
डॉक्टरों की सलाह:
- नो मोबाइल ज़ोन: दिन का कुछ समय बिना फोन के बिताएं।
- फैमिली टाइम: अपनों से बात करें।
- व्यायाम: योग और टहलना अपनी दिनचर्या में शामिल करें।